आज का सवाल मेरा उन सब से है जो पूरा जीवन खर्च कर देने के बाद भी कुछ ढूंढते हुए पाए जाते है । क्या है “कर्मंये वधिकरासते मा फलेषु कदचना” ? और क्यों है ये ? क्यों नही हम अपने ख़ुद के नियमों के लिए अपना जीवन जीयें ? क्यों हम किसी और के हालत मैं बने नियमों को ढोने के लिए पूरा जीवन निकल जाने के बाद एहसास करते है कि अब देर हो चुकी है ख़ुद के लिए जीने को । कॉलेज समय से ही अक्सर ख़ुद से बात करते हुए वादा किया था कि स्वय्मं से कभी अन्याय नही करेंगे । कभी वादा पूरा होता नहीं लगता तो कभी उसके लिए समय ही नही मिलता । ३५-४०वां साल जीवन का अर्ध विराम माना जाता है। क्या यह सही समय नही है ख़ुद के लिए सोचने का और ” कर्मंये वधिकरासते मा फलेषु कदचना” को थोडी देर के लिए बाजु में रखने का । जीवन को जीवन की तरह ख़ुद के लिए जीने के लिए । कुछ याद करने का कि किस बात से ख़ुद को खुशी मिलेगी ? क्या किसी हिल स्टेशन पर जाने कि तम्मना है या किसी पुराने दोस्त से मिलने से खुशी मिलेगी ? कभी कभी ठहर कर रुक कर दो घड़ी को साँस ले ले । वैसे मेरा मानना है कि कुछ दिन हमें अपने लिए निकाल कर मूड कर देख लेना चाहिए की हम कहाँ जाना चाहते थे और कहाँ पहुँच गए । तभी हम जीवन को कुछ मोड़ सकते हैं।
कर्मंये वाधिकारास्ते मा फलेषु कदाचना – कृष्ण आर्य
March 16, 2008 by KRISHAN ARYA
जीवन का संघर्ष वास्तव में हमारे पैदा होते ही शुरू हो जाते है। पढ़ाई, माँ बाप की सलाहें अध्यापकों का दबाव खेल से दूर रहकर पढ़ाई की और ध्यान सब कुछ हमारे मस्तिस्क पर एक दबाव के रूप में उभरतें हैं । हम कर्म करते जातें है फिर अपने भविष्य और फिर बच्चों के जिम्मेवारी के लिए नौकरी के लिए इमोशनल हो कर जीवन को ध्यान देने और हमें अपने आप पर कभी ध्यान देने का वक्त ही नहीं देते । एक के बाद एक सपनो को साकार करने के लिए एक के बाद एक सपने, कुछ अपने कुछ नेक्स्ट जेनरेशन के, पूरे करने के लिए हम जुट जाते है । हमारा वित्त संचय का उद्देश्य हमें इस हद तक ख़ुद से दूर कर देता है की जीवन हाथों से कब निकल गया पता ही नही चल पता। एक कहावत है ” पूत कपूत तौ क्यों धन संचय, पूत सपूत तौ क्यों धन संचय ” । फिर क्यों हम धन संचय को ख़ुद के जीवन से ज्यादा मानते है ?
शुभ कामनाओं सहित – ‘कृष्ण आर्य’
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Hi krishan,
really the bolg has come up very nice. great effort. i would like to know in detail about the msg which motivated you to create it. what is the link is with wealth ???
by the way after a long time i saw your pics. really speaking, first i could not recognise you.
thanks for providing me the link. have a nice day.
-narendra
Dear Krishan,
Its really nice to see the thought process churning inside your mind. While its true that the fight for survival starts the moment one is born, its nothing unique with human race. This is true of all animals. Survival of fittest is the mantra in Nature and any one less fit dosent find himself alive for long. At the same time, the urge to see own offsprings blossming is equally strong and in case of Lions and Tigers, it is often seen that cubs of other males met with a cruel end if faced with another adult. Thus on the similar lines, we, the human beings also have to constantly keep fighting for our own survival in the corporate world and keep pushing to see that our children excel in their acadamic careers.
Kudos for writing aexcellent blog, expecting many more to come…
क्या बात है बन्धु!
लगे रहो. और खुश रहो!
गीता में कृष्ण ने जो कहा था, उस से तो मैं ज्यादा सहमत नहीं हूं. आखिर बिना उद्देशय ( फल प्राप्ति) के काम करने में क्या मजा है?
Religion is nothing it is only belief. then it the quotes of Geeta can not be compared with our own openion.
however it is true that no one can work without the aim and their results/benifites.
keep it up good…..